Monday, July 18, 2011

न बना पार्क, न बचे ऐतिहासिक जीवाश्म उदासीनता : 13-14 करोड़ वर्ष पुरानी जीवाश्म घाटी हो गई वीरान

राजमहल से विनोद श्रीवास्तव राजमहल पहाडि़यों की यह वही श्रृंखला है, जिसने जीवाश्म वैज्ञानिक (पैलियोवोटनिस्ट) डा. बीरबल साहनी को दुनिया में अमर बना दिया। बिहार-झारखंड की सीमा पर साहिबगंज जिले के निकट है यह क्षेत्र मिर्जाचौकी। इसकी दो-तीन किलोमीटर की परिधि में फैले पेड़-पौधों के जीवाश्म की पहचान 1910 के आसपास डा. साहनी ने की थी। उस समय मिले पेंटोजाइलन व विलियमसोनिया सेवोरडियाना जीवाश्म की आयु 13 से 14 करोड़ साल आंकी गई। तब से यहां की पहाडि़यां और उनकी घाटियां राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई लेकिन अब वह आकर्षण खत्म होता जा रहा है। जब जीवाश्म शोधकर्ताओं की दिलचस्पी इस पहाड़ी श्रृंखला में बढ़ी तो सरकार को इसकी महत्ता समझ में आई लेकिन झारखंड बनने के बाद ही 2005-06 में इस क्षेत्र को जीवाश्म पार्क का दर्जा देने की घोषणा हुई। उस घोषणा पर भी अमल नहीं हो सका। यह पार्क वन भूमि व रैयती जमीन के लफड़े में नहीं बन सका। वर्षो पहले यह क्षेत्र जीवाश्मों से भरा पड़ा था, लेकिन अब वे इक्का-दुक्का ही नजर आते हैं। और तो और धोकुटी, चूनाखड़ी, वृंदांग, हेड चतरा, मंगल मेडो, मंडरो आदि जीवाश्म के खास प्रक्षेत्र माने जाते थे, आज वे क्षेत्र भी लगभग विलुप्त हो चुके हैं। ये सब अवैध उत्खनन की भेंट चढ़ गए।
क्या है जीवाश्म : चट्टानों के बीच दबकर संरक्षित रह गए जीव-जंतुओं और पौधों के मृत अवशेष अंगों को जीवाश्म कहते हैं। संभवत: यहां उपस्थित जीवाश्म लाखों वर्ष पूर्व ज्वालामुखी विस्फोट के कारण दबकर संरक्षित रह गए, जिसकी खोज डा. साहनी ने की। लखनऊ में हैं जीवाश्म के नमूने : लखनऊ स्थित डा. बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट आफ पैलियोवोटनी में राजमहल क्षेत्र के जीवाश्मों की लंबी श्रृंखला देखी जा सकती है। वर्तमान में जीवाश्मों की इस गैलरी को नजदीक से देखने वाले शोघकर्ताओं की लंबी फेहरिश्त है। यह बात अलग है कि जीवाश्मों की यह खुली प्रयोगशाला झारखंड के शोधकर्ताओं की कुछ खास मदद नहीं कर सकती क्योंकि यह खुद ही विलुप्त होने के कगार पर है। जैव विकास को समझने का जरिया : जीवाश्मों के अध्ययन से ही यह पता चलता है कि पौधों और जीव-जंतुओं की कौन सी प्रजाति कितनी वर्ष पुरानी है। रेडियो कार्बन डेंटिंग बताती है कि वह किस काल की है। सूरजा को है सरकार से आस : टागा पहाड़ क्षेत्र के सूरजा पहाडि़या को सरकार से बड़ी आस है। उसे विश्र्वास है कि जब पार्क बनेगा और उस क्षेत्र का विस्तार होगा तो पहाडि़या जाति की भी उन्नति होगी। यही वजह है कि जीवाश्म का एक टुकड़ा भी ले जाने वालों से वह उलझ पड़ता है, परंतु ऐसी घटनाएं कम ही होती हैं क्योंकि जीवाश्म लुप्तप्राय हो चुके हैं। शोधकर्ता जीवाश्म ढोकर ले जा चुके हैं।

Monday, July 4, 2011

पद्मनाभस्वामी मंदिर का खजाना एक लाख करोड़ रुपये

केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के गुप्त कक्षों से मिले खजाने का आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये पहंुच गया है। इसके साथ ही यह मंदिर देश का सबसे अमीर मंदिर बन गया है। साथ ही इसकी सुरक्षा और संरक्षण को लेकर विवाद पैदा हो गया है। मंदिर के छह गुप्त कमरों में मिले अथाह खजाने की सूची बनाने का रविवार को छठा दिन रहा। इस खजाने में भगवान की विष्णु की सोने की चार फुट लंबी प्रतिमा, कीमती जवाहरात हैं। इसके अलावा, सात स्वर्ण प्रतिमाएं जिनमें हरेक का वजन दो किलो है। इस खजाने में एक 15 फीट लंबा सोना का बेहद खूबसूरत हार भी है। पन्ना जड़े मुकुट, ढेरों माणिक्य और हीरे भी हैं। बेहद कीमती खजाने के यह गुप्त कक्ष जमीन से बीस फुट नीचे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लंबे समय से बंद मंदिर के तहखाने को 1857 के बाद 27 जून को खोला गया था। गैर सरकारी आकलन के अनुसार, इस मंदिर के तहखाने के छह कक्षों में रखे गए सोने, हीरे और अन्य बहुमूल्य रत्‍‌नों की कीमत करीब एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। रविवार के अवकाश के बाद सोमवार को खजाने की चीजों की गिनती का काम आगे बढ़ेगा। खजाने की गिनती का काम अगले शनिवार तक पूरा होने की संभावना है। मंदिर की सुरक्षा योजना पर विचार कर रही पुलिस खजाने की खबर दुनिया को हो जाने के बाद मंदिर परिसर की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। सुरक्षा इंतजामों के पहले चरण में 60 जवानों को तैनात किया गया। पुलिस अधिकारी ने बताया कि यहां स्थाई और पूर्ण सुरक्षित सुरक्षा घेरा बनाए जाने की चर्चा चल रही है। पुलिस महानिदेशक जैकब पुनोस ने कहा कि नई सुरक्षा व्यवस्था में विशेष प्रशिक्षित जवान और आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसको लेकर राज्य पुलिस की केंद्र से बात चल रही है। हालांकि सरकार ने फिलहाल सुरक्षा व्यवस्था कड़ करते हुए मंदिर की सुरक्षा के लिए 60 जवान तैनात कर दिए हैं। खजाने के संरक्षण और सुरक्षा पर विवाद छिड़ी बहस : इतिहासकार, शिक्षाविद् और मंदिर संस्कृति के जानकार यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि इतने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाले इस खजाने का संरक्षण कैसे किया जाए? कई का मानना है कि यह खजाना त्रावणकोर के राजाओं की ईमानदारी और सादगी दर्शाता है। जिन्होंने इस खजाने से वाकिफ होने के बाद भी उसमें से कुछ भी नहीं निकाला। सरकार अधीन नहीं ले सकती खजाना इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नारायणन के अनुसार, त्रावणकोर के राजाओं ने ऐसी व्यवस्था तैयार की है कि केंद्र या राज्य सरकार खजाने को अपने अधीन नहीं ले सकती। ऐसे कई मंदिरों के उदाहरण हैं जिनके खजाने को सरकार ने नियंत्रण में लिया और बाद वे भ्रष्टाचार, बदहाली और अनियमितताओं के शिकार हुए। नारायणन ने कहा कि मेरे विचार से, मंदिर का एक संग्रहालय बना देना चाहिए और तहखाने से मिली चुनिंदा चीजों को प्रदर्शित कर देना चाहिए। अन्य वस्तुओं को किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए। इतिहासकार और लेखक एम.जी. शशिभूषण का मानना है कि सदियों से बंद पड़े इस खजाने को आने वाली पीढि़यों के लिए रखना चाहिए। खजाने में विजयनगर और यूरोपीय देशों की शाही हुकूमतों के भी सिक्के मिले हैं। जिन्हें संभवत: उपहार में दिया गया होगा। 1947 में सरकार के अधीन आ गया था मंदिर 1947 में भारत में विलय होने के बाद इस इलाके के सभी मंदिरों को त्रावणकोर देवभूमि बोर्ड के सुपुर्द कर दिया गया था। मगर पद्मनाभस्वामी मंदिर का संरक्षण सरकारी सहमति से शाही परिवार को मिल गया था। आखिरी राजा श्री चित्रा तिरूनल बलराम वर्मा को राजप्रमुख (गवर्नर के समान) नियुक्त किया गया था|