Thursday, March 24, 2011

भोपाल को भोजपाल बनाने की प्रकिया शुरू


 फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किग साइट और सड़कों पर उतर कर लोगों द्वारा किए गए विरोध के बावजूद प्रदेश की भाजपा सरकार भोपाल शहर का नाम भोजपाल करने पर आमादा है। सरकार ने अपनी घोषणा पर अमल करते हुए नाम परिवर्तन की प्रक्रिया का श्री गणेश कर दिया है। राज्य सरकार ने भोपाल जिला प्रशासन को पत्र लिखकर भोपाल का नाम भोजपाल करने का प्रस्ताव मांगा है। जिला प्रशासन के आला अधिकारियों ने इसकी पुष्टि कर दी है। विभाग से इस आशय का पत्र मिलते ही कलक्टरेट के अधिकारियों ने राजाभोज और भोपाल के इतिहास को खंगालना शुरू कर दिया। प्रशासन अब इस उधेड़बुन में लगा हुआ है कि शहर का नाम बदलने पर रेलवे स्टेशन और पोस्ट ऑफिस का भी नाम बदलना पड़ेगा या नहीं। इसके अलावा राजस्व रिकॉर्ड में भी शहर के नाम की तब्दीली होगी या नहीं। 28 फरवरी को राजाभोज सहस्त्राबदी वर्ष समारोह के अवसर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल का नाम भोजपाल करने की घोषणा की थी। हालांकि कई सालों पहले भोपाल के उपनगर बैरागढ़ का नाम संत हिरदाराम नगर करने का प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को भेजा गया था जिस पर आज तक निर्णय नहीं हो पाया। चूंकि कांग्रेस पार्टी खुद इस नामकरण के खिलाफ है इसलिए यह माना जा रहा है कि नाम परिवर्तन का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजने के बाद भी नाम परिवर्तन होना आसान नहीं है|

Thursday, March 10, 2011

11 सदी बाद मिला कटारमल सूर्य मंदिर का प्रवेश द्वार


11वीं शताब्दी में बना अल्मोड़ा के कटारमल सूर्य मन्दिर के भीतर अब ढलते सूरज की किरणें नहीं, उगते सूरज की लाली बिखरने लगी है। पुरातत्वविदों ने कोणार्क से भी 200 साल पुराने इस मंदिर के पूरब दिशा के उस दरवाजे को खोल दिया है, जो सदियों से दीवार के अंदर दबा था। 11वीं शताब्दी में बना अल्मोड़ा का कटारमल पहला ऐसा सूर्य मन्दिर है जिसका प्रवेशद्वार पश्चिम में था। श्रद्धालु इसी से मंदिर में प्रवेश करते थे। पुरातत्वविद् हमेशा से यह मानने को तैयार नहीं थे कि किसी सूर्य मंदिर का का प्रवेशद्वार पूरब दिशा में न हो। विशेषज्ञों को आशंका थी कि पूरब दिशा का दरवाजा कहीं दबा है। पिछले साल विभाग ने यह जानने में सफल रहा कि कटारमल का मुख्य द्वार पश्चिम नहीं, पूरब दिशा में है। अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. डीएन डिमरी ने बताया कि एक साल की कड़ी मशक्कत के बाद दरवाजे के बाहर चुनी गई दीवार को हटा दिया गया है। इस काम को अंजाम देने में काफी सावधानी बरती गई। क्योंकि दीवार ध्वस्त करते समय जरा सी लापरवाही दरवाजे को क्षति पहुंचा सकती थी। यह मन्दिर इस लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है कि इसका इतिहास कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी करीब 200 साल पुराना है। आर्कियोलॉजिस्ट डा. डिमरी के मुताबिक कटारमल सूर्य मन्दिर को 11वीं शताब्दी का माना जाता है। मगर, कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिससे कह सकते हैं कि यहां पर सूर्य मन्दिर आठवीं-नवीं शताब्दी में भी था। उस समय के कुछ लकड़ी के गुंबद पहले खोजे जा चुके हैं। जिन्हें दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखा गया है। हो सकता है कि इसके बाद भी यहां पर मन्दिर का पुनर्निर्माण किया गया हो। ऐसा है पूरब का प्रवेशद्वार : लंबाई: पत्थर की आठ सीढि़यां (हर सीढ़ी के बीच में एक फीट का अंतर), चौड़ाई: करीब दो मीटर|