उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का छोटा सा गांव सोनिक अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर आने वाला है। रेलवे लाइन के किनारे बसे गांव के गर्भ में 2500 साल पुरानी सभ्यता छिपे होने का पता जो चल गया है। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को यहां पर खुदाई के दौरान छठी-सातवीं शताब्दी के सांस्कृतिक व रिहायशी अवशेष मिले हैं। सोनिक रेलवे स्टेशन से करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर स्थित बसहा झील के पास 150 मीटर क्षेत्र में उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग की टीम को खोदाई के दौरान हजारों वर्ष पहले के रिहायशी व सांस्कृतिक अवशेष मिले। अवशेषों में कई ऐसी वस्तुएं मिली हैं, जिससे यहां पर प्राचीन सभ्यता के होने का अनुमान लगाया जा रहा है। अवशेषों में मिट्टी के काले व लाल रंग के भांड (बर्तन), थाली, कटोरे ,छोटे-बड़े आकार के घड़े, अलंकृति व चित्रित पात्र व कुछ छोटे आकार के पूजा पात्र मिले हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक अवशेषों में हड्डी के बने हुए बाण, बाणों के आगे नुकीले हिस्से को रखने के लिये हड्डी के खोल, गले में पहनने वाले पत्थर व मिट्टी के मनके आदि मिले हैं। इसके अलावा रिहायशी अवशेषों में मिट्टी की दीवारों व झोपड़ी के अवशेष मिले। पुरातत्व विभाग के निदेशक डा. राकेश तिवारी व उत्खनन निदेशक डा.राकेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि जिस प्रकार के अवशेष मिले हैं वह करीब ढाई हजार वर्ष पुराने प्रतीत हो रहे हैं। करीब 150 मीटर के दायरे में यह चिह्न पाए गए हैं। डा. सुभाष कुमार यादव ने बताया कि खुदाई 30 तक खत्म कर ली जायेगी। अवशेषों को लखनऊ ले जाया जायेगा। वहां इसे जांच के लिये प्रयोगशाला भेजा जाएगा। जांच के बाद इसकी पूरी रिपोर्ट बनायी जायेगी। जानवरों की हड्डियां मिलीं : उप्र राज्य पुरातत्व विभाग के निदेशक डा. राकेश तिवारी ने 2001 में सर्वेक्षण कर सोनिक में इन अवशेषों की खोज की थी। टीम ने पिछले माह की दस तारीख से खुदाई शुरू की। एक जगह करीब ढाई मीटर खुदाई के बाद जानवरों की हड्डियां व मिट्टी के भांड के काले व लाल रंग के टुकडे़ मिले। सड़क के दूसरी ओर हार्ड मार्क के निशान मिले जिसमें अंदाजा लगाया जा रहा है कि छप्पर आदि खड़े करने के लिये बांस गाड़ने के लिये हार्ड मार्क का प्रयोग किया जाता होगा। करीब आधा दर्जन गोल व यू आकार के चूल्हे भी पाए गए हैं। सामुदायिक चूल्हा भी मिला है। चूल्हों के पास की जमीन काली पायी गयी। खोदाई के स्थान पर छोटे-बड़े कई घरों की मोटी दीवारों की आकृति भी पायी गयी है। फर्शनुमा जमीन भी मिली है। चार मीटर से अधिक गहरी खोदाई में दीवारों में मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े गड़े पाए गए। एक टैरा कोटा सिलिंग बाल भी मिली है जिसका प्रयोग संभवत: गुलैल आदि में किया जाता रहा होगा।
Saturday, April 30, 2011
Thursday, April 28, 2011
संस्कृतियों के टेढ़े-मेढ़े रास्ते
| मिजोरम, नगालैंड और मेघालय ईसाई बहुल प्रदेश हैं। साथ ही ये राज्य सरकारी तौर पर अंग्रेजी भाषी हैं। बात भाषा की नहीं है। एक सज्जन बता रहे थे कि किसान से कहा जाता है- पांच एम. एल. दवा डालो। मगर पांच एम. एल. उसके बोध में नहीं है। स्थानीय महौल से पूरी तरह विच्छिन्न भाषा से संवाद इन्हें शिक्षा से दूर न करे तो क्या करे! इनकी अपनी बोलियों को न तो अंग्रेजों ने प्रोत्साहन दिया, न स्वतंत्र भारत की सरकार ने..टवारे ने बंगाल को तो बांटा ही, उत्तर-पूर्व के प्रमुख राज्यों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया। इसी के कारण त्रिपुरा पहुंचना आज भी टेढ़ी खीर है। गौहाटी से सिलचर आनेवाली सड़क से ही सिलचर से थोड़ा पहले बदरपुर से रास्ता त्रिपुरा के लिए है। ट्रेन से भी इसी बदरपुर से धर्मनगर तक आप जा सकते हैं। उसके आगे अगरतला तक के लिए कोई और सवारी। मेघालय के खासी और जयंतिया लोगों की खेती की जमीनें बांग्लादेश सीमा के भीतर हैं। जयंतिया लोगों की पारंपरिक राजधानी जयंतियापुर बांग्लादेश में है। त्रिपुरा की पुरानी रियासत का भी एक बड़ा भाग बांग्लादेश में ही है। ऐसे में सीमा पर कंटीले तार लगाने का उत्साह! विभाजन के समय असम के नेताओं को भय था कि अगर सिलहट के लोग भारत में आने के पक्ष में मतदान कर देंगे तो असम में मुस्लिम बहुमत हो जाएगा। जब ऐसा नहीं हुआ तो वे प्रसन्न हुए। छोटा-सा हिस्सा बराक घाटी का मिला, जो पलायित शरणार्थियों से भरा हुआ है। यहीं मुसलमानों की समस्या पर भी विचार करना लाजिमी है। लक्षद्वीप और कश्मीर के बाद असम सर्वाधिक मुस्लिम आबादी के प्रतिशत वाला प्रांत है। इसे लेकर यहां काफी राजनीति होती रहती है। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा तो वे लोग हैं, जो मुगल सेना के साथ आए थे और लौटकर नहीं जा सके। इनके साथ कुछ ऐसी रवायतें जुड़ी हैं, जो बाकी कहीं भी मुसलमानों में नहीं पाई जातीं। मसलन, इन्होंने स्थानीय महिलाओं से बगैर धर्मातरण कराए निकाह पढ़ाए। मणिपुर में भी मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी इसी प्रक्रिया में बनी है। दूसरी बात यह कि इस समस्या के बारे में बात करते हुए हम मान लेते हैं कि भारत सदा से ऐसे ही था। आजादी से पहले आज के बांग्लादेश और भारत के अन्य हिस्सों से भांति-भांति के लोग आकर इस इलाके में बसते रहे। इस तरह यह अलग-अलग मानव समूहों की मिली-जुली बस्ती की तरह बन गया है। इन सबने इस इलाके को समृद्ध बनाने में मदद की है। धर्म के मामले में चाहे हिंदू हों, चाहे मुसलमान या ईसाई, सबको उनकी मूल धारा से अलग करके देखना ही उचित होगा, क्योंकि धर्मातरण के बावजूद जनजातीय प्रभावों ने उन्हें विशेष पहचान दी है। मिजोरम, नगालैंड और मेघालय ईसाई बहुल प्रदेश हैं। साथ ही ये राज्य सरकारी तौर पर अंग्रेजी भाषी हैं। बात भाषा की नहीं है। एक सज्जन बता रहे थे कि किसान से कहा जाता है- पांच एम. एल. दवा डालो। मगर पांच एम. एल. उसके बोध में नहीं है। स्थानीय महौल से पूरी तरह विच्छिन्न भाषा से संवाद इन्हें शिक्षा से दूर न करे तो क्या करे! इनकी अपनी बोलियों को न तो अंग्रेजों ने प्रोत्साहन दिया, न स्वतंत्र भारत की सरकार ने। अंग्रेजों ने तो इन्हें आजादी के आंदोलन से दूर रखने के लिए सचेत रूप से अंग्रेजी और ईसाइयत दी, लेकिन बाद में भी सरकार ने सहानुभूतिपूर्वक कुछ नहीं किया। सो प्राचीन परंपराओं के साथ यहां की जनजातियों ने संगठित धर्म अपनाए और इस तनाव को आप लगातार देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, मेघालय की तीनों जनजातियां मातृवंशात्मक हैं, पर ईसाइयत की मान्यताएं इससे मेल नहीं खातीं। अरुणाचल प्रदेश तो बाकायदे सरकारी तौर पर प्रकृतिपूजक लोगों की बहुतायत वाला प्रदेश है। वहां दोनों पाउलो की पूजा होती है। वह शायद एकमात्र ऐसा प्रदेश है, जिसकी कोई राजकीय भाषा नहीं। क्या हल है इस उत्तर-पूर्व नामक समस्या का? सबसे पहली बात तो यह कि बहुमतवादी लोकतंत्र में 500 से अधिक सांसदों की संसद में यहां के लोग अपना निर्णायक प्रतिनिधित्व नहीं देखते। सो, उसमें कोई भी खास रुचि नहीं लेता। स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं भी दलाल राजनीतिक वर्ग के कब्जे में हैं। सैनिक समाधान कोई समाधान नहीं है, यह तय है। बांग्लादेश, चीन और म्यांमार से दोस्ताना रिश्तों के बगैर इस समस्या का एक पहलू हल होने से रहा। स्वशासन के संबंध में भी नए प्रयोग करने होंगे। अन्यथा महज भूभागीय एकता की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है समूचे देश को। रोज-रोज की हिंसा से समूचे देश की संवदनाएं भोथरी हो रही हैं। काले कानूनों के लिए तर्क के बतौर इस इलाके का उपयोग भी बंद होना चाहिए। |
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