Friday, August 12, 2011
Monday, July 18, 2011
न बना पार्क, न बचे ऐतिहासिक जीवाश्म उदासीनता : 13-14 करोड़ वर्ष पुरानी जीवाश्म घाटी हो गई वीरान
राजमहल से विनोद श्रीवास्तव राजमहल पहाडि़यों की यह वही श्रृंखला है, जिसने जीवाश्म वैज्ञानिक (पैलियोवोटनिस्ट) डा. बीरबल साहनी को दुनिया में अमर बना दिया। बिहार-झारखंड की सीमा पर साहिबगंज जिले के निकट है यह क्षेत्र मिर्जाचौकी। इसकी दो-तीन किलोमीटर की परिधि में फैले पेड़-पौधों के जीवाश्म की पहचान 1910 के आसपास डा. साहनी ने की थी। उस समय मिले पेंटोजाइलन व विलियमसोनिया सेवोरडियाना जीवाश्म की आयु 13 से 14 करोड़ साल आंकी गई। तब से यहां की पहाडि़यां और उनकी घाटियां राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई लेकिन अब वह आकर्षण खत्म होता जा रहा है। जब जीवाश्म शोधकर्ताओं की दिलचस्पी इस पहाड़ी श्रृंखला में बढ़ी तो सरकार को इसकी महत्ता समझ में आई लेकिन झारखंड बनने के बाद ही 2005-06 में इस क्षेत्र को जीवाश्म पार्क का दर्जा देने की घोषणा हुई। उस घोषणा पर भी अमल नहीं हो सका। यह पार्क वन भूमि व रैयती जमीन के लफड़े में नहीं बन सका। वर्षो पहले यह क्षेत्र जीवाश्मों से भरा पड़ा था, लेकिन अब वे इक्का-दुक्का ही नजर आते हैं। और तो और धोकुटी, चूनाखड़ी, वृंदांग, हेड चतरा, मंगल मेडो, मंडरो आदि जीवाश्म के खास प्रक्षेत्र माने जाते थे, आज वे क्षेत्र भी लगभग विलुप्त हो चुके हैं। ये सब अवैध उत्खनन की भेंट चढ़ गए।
क्या है जीवाश्म : चट्टानों के बीच दबकर संरक्षित रह गए जीव-जंतुओं और पौधों के मृत अवशेष अंगों को जीवाश्म कहते हैं। संभवत: यहां उपस्थित जीवाश्म लाखों वर्ष पूर्व ज्वालामुखी विस्फोट के कारण दबकर संरक्षित रह गए, जिसकी खोज डा. साहनी ने की। लखनऊ में हैं जीवाश्म के नमूने : लखनऊ स्थित डा. बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट आफ पैलियोवोटनी में राजमहल क्षेत्र के जीवाश्मों की लंबी श्रृंखला देखी जा सकती है। वर्तमान में जीवाश्मों की इस गैलरी को नजदीक से देखने वाले शोघकर्ताओं की लंबी फेहरिश्त है। यह बात अलग है कि जीवाश्मों की यह खुली प्रयोगशाला झारखंड के शोधकर्ताओं की कुछ खास मदद नहीं कर सकती क्योंकि यह खुद ही विलुप्त होने के कगार पर है। जैव विकास को समझने का जरिया : जीवाश्मों के अध्ययन से ही यह पता चलता है कि पौधों और जीव-जंतुओं की कौन सी प्रजाति कितनी वर्ष पुरानी है। रेडियो कार्बन डेंटिंग बताती है कि वह किस काल की है। सूरजा को है सरकार से आस : टागा पहाड़ क्षेत्र के सूरजा पहाडि़या को सरकार से बड़ी आस है। उसे विश्र्वास है कि जब पार्क बनेगा और उस क्षेत्र का विस्तार होगा तो पहाडि़या जाति की भी उन्नति होगी। यही वजह है कि जीवाश्म का एक टुकड़ा भी ले जाने वालों से वह उलझ पड़ता है, परंतु ऐसी घटनाएं कम ही होती हैं क्योंकि जीवाश्म लुप्तप्राय हो चुके हैं। शोधकर्ता जीवाश्म ढोकर ले जा चुके हैं।
क्या है जीवाश्म : चट्टानों के बीच दबकर संरक्षित रह गए जीव-जंतुओं और पौधों के मृत अवशेष अंगों को जीवाश्म कहते हैं। संभवत: यहां उपस्थित जीवाश्म लाखों वर्ष पूर्व ज्वालामुखी विस्फोट के कारण दबकर संरक्षित रह गए, जिसकी खोज डा. साहनी ने की। लखनऊ में हैं जीवाश्म के नमूने : लखनऊ स्थित डा. बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट आफ पैलियोवोटनी में राजमहल क्षेत्र के जीवाश्मों की लंबी श्रृंखला देखी जा सकती है। वर्तमान में जीवाश्मों की इस गैलरी को नजदीक से देखने वाले शोघकर्ताओं की लंबी फेहरिश्त है। यह बात अलग है कि जीवाश्मों की यह खुली प्रयोगशाला झारखंड के शोधकर्ताओं की कुछ खास मदद नहीं कर सकती क्योंकि यह खुद ही विलुप्त होने के कगार पर है। जैव विकास को समझने का जरिया : जीवाश्मों के अध्ययन से ही यह पता चलता है कि पौधों और जीव-जंतुओं की कौन सी प्रजाति कितनी वर्ष पुरानी है। रेडियो कार्बन डेंटिंग बताती है कि वह किस काल की है। सूरजा को है सरकार से आस : टागा पहाड़ क्षेत्र के सूरजा पहाडि़या को सरकार से बड़ी आस है। उसे विश्र्वास है कि जब पार्क बनेगा और उस क्षेत्र का विस्तार होगा तो पहाडि़या जाति की भी उन्नति होगी। यही वजह है कि जीवाश्म का एक टुकड़ा भी ले जाने वालों से वह उलझ पड़ता है, परंतु ऐसी घटनाएं कम ही होती हैं क्योंकि जीवाश्म लुप्तप्राय हो चुके हैं। शोधकर्ता जीवाश्म ढोकर ले जा चुके हैं।
Friday, July 15, 2011
Monday, July 4, 2011
पद्मनाभस्वामी मंदिर का खजाना एक लाख करोड़ रुपये
केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के गुप्त कक्षों से मिले खजाने का आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये पहंुच गया है। इसके साथ ही यह मंदिर देश का सबसे अमीर मंदिर बन गया है। साथ ही इसकी सुरक्षा और संरक्षण को लेकर विवाद पैदा हो गया है। मंदिर के छह गुप्त कमरों में मिले अथाह खजाने की सूची बनाने का रविवार को छठा दिन रहा। इस खजाने में भगवान की विष्णु की सोने की चार फुट लंबी प्रतिमा, कीमती जवाहरात हैं। इसके अलावा, सात स्वर्ण प्रतिमाएं जिनमें हरेक का वजन दो किलो है। इस खजाने में एक 15 फीट लंबा सोना का बेहद खूबसूरत हार भी है। पन्ना जड़े मुकुट, ढेरों माणिक्य और हीरे भी हैं। बेहद कीमती खजाने के यह गुप्त कक्ष जमीन से बीस फुट नीचे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लंबे समय से बंद मंदिर के तहखाने को 1857 के बाद 27 जून को खोला गया था। गैर सरकारी आकलन के अनुसार, इस मंदिर के तहखाने के छह कक्षों में रखे गए सोने, हीरे और अन्य बहुमूल्य रत्नों की कीमत करीब एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। रविवार के अवकाश के बाद सोमवार को खजाने की चीजों की गिनती का काम आगे बढ़ेगा। खजाने की गिनती का काम अगले शनिवार तक पूरा होने की संभावना है। मंदिर की सुरक्षा योजना पर विचार कर रही पुलिस खजाने की खबर दुनिया को हो जाने के बाद मंदिर परिसर की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। सुरक्षा इंतजामों के पहले चरण में 60 जवानों को तैनात किया गया। पुलिस अधिकारी ने बताया कि यहां स्थाई और पूर्ण सुरक्षित सुरक्षा घेरा बनाए जाने की चर्चा चल रही है। पुलिस महानिदेशक जैकब पुनोस ने कहा कि नई सुरक्षा व्यवस्था में विशेष प्रशिक्षित जवान और आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसको लेकर राज्य पुलिस की केंद्र से बात चल रही है। हालांकि सरकार ने फिलहाल सुरक्षा व्यवस्था कड़ करते हुए मंदिर की सुरक्षा के लिए 60 जवान तैनात कर दिए हैं। खजाने के संरक्षण और सुरक्षा पर विवाद छिड़ी बहस : इतिहासकार, शिक्षाविद् और मंदिर संस्कृति के जानकार यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि इतने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाले इस खजाने का संरक्षण कैसे किया जाए? कई का मानना है कि यह खजाना त्रावणकोर के राजाओं की ईमानदारी और सादगी दर्शाता है। जिन्होंने इस खजाने से वाकिफ होने के बाद भी उसमें से कुछ भी नहीं निकाला। सरकार अधीन नहीं ले सकती खजाना इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नारायणन के अनुसार, त्रावणकोर के राजाओं ने ऐसी व्यवस्था तैयार की है कि केंद्र या राज्य सरकार खजाने को अपने अधीन नहीं ले सकती। ऐसे कई मंदिरों के उदाहरण हैं जिनके खजाने को सरकार ने नियंत्रण में लिया और बाद वे भ्रष्टाचार, बदहाली और अनियमितताओं के शिकार हुए। नारायणन ने कहा कि मेरे विचार से, मंदिर का एक संग्रहालय बना देना चाहिए और तहखाने से मिली चुनिंदा चीजों को प्रदर्शित कर देना चाहिए। अन्य वस्तुओं को किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए। इतिहासकार और लेखक एम.जी. शशिभूषण का मानना है कि सदियों से बंद पड़े इस खजाने को आने वाली पीढि़यों के लिए रखना चाहिए। खजाने में विजयनगर और यूरोपीय देशों की शाही हुकूमतों के भी सिक्के मिले हैं। जिन्हें संभवत: उपहार में दिया गया होगा। 1947 में सरकार के अधीन आ गया था मंदिर 1947 में भारत में विलय होने के बाद इस इलाके के सभी मंदिरों को त्रावणकोर देवभूमि बोर्ड के सुपुर्द कर दिया गया था। मगर पद्मनाभस्वामी मंदिर का संरक्षण सरकारी सहमति से शाही परिवार को मिल गया था। आखिरी राजा श्री चित्रा तिरूनल बलराम वर्मा को राजप्रमुख (गवर्नर के समान) नियुक्त किया गया था|
Wednesday, June 1, 2011
जल को देवता मानते हैं हिमाचल के लोग
सरकारी नलों के जमाने में भी हिमाचल के अधिकांश जिलों के ग्रामीण आज भी कुओं-बावडि़यों को सहेज कर रखे हुए हैं, क्योंकि वे जल को देवता मानते हैं और उसकी पूजा करते है। ग्रामीण इलाकों में तो पानी भरने से पहले जल देवता का अभिषेक किया जाता है। हिमाचल में सरकारी नल और हैंडपंपों की मौजूदगी के बावजूद विभिन्न जिलों में स्थित गांवों में लोग अभी भी प्राकृतिक जलस्रोतों का पानी ही उपयोग में लाते हैं। जलस्रोतों को औलाद की तरह मानने वाले लोग सुबह-सवेरे पानी लेने के लिए बावड़ी पर ही पहुंचते हैं। इसमें से एक लोटा शुद्ध जल अलग से भरकर पूजा के लिए रख दिया जाता है। हर जलस्रोत के पास छोटा सा देवालय भी जरूर मिलेगा। कुछ ऐसा ही नजारा सुन्नी का न्हेवट, ठियोग, रेगटू और बिजलीधार, लोअर लोहारा आदि देखने को मिलता है। प्राकृतिक स्रोत के जल से घर के मंदिर में ठाकुर अथवा ग्राम देवता की प्रतिमा का अभिषेक करने के बाद उसका सेवन किया जाता है। शिमला जिले के दूरस्थ गांव तंदाली के लोग स्थानीय नदी दोगड़ा को मां की तरह मानते हैं। यहां के पानी को पवित्र माना जाता है। पानी भरने से पहले जल देवता की मूर्ति का अभिषेक किया जाता है। कोई भी व्यक्ति दोगड़ा नदी में किसी तरह का कचरा नहीं फेंकता है। बुजुर्ग मोहीराम व नोखराम का कहना है कि उनके पूर्वजों ने इन बावडि़यों को मुश्किल से तैयार किया था। वह अपनी औलाद से भी बढ़कर इनकी देखभाल करते रहे। यही संस्कार उन्होंने अगली पीढि़यों को दिए। क्यारा पंचायत के लोगों का कहना है कि शहर जाने के लिए उन्हें आठ किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता है। रास्ते में पड़ने वाली इन बावडि़यों के इर्द-गिर्द पेड़ लगाए गए हैं। पानी पीकर पेड़ों की शीतल छाया में बैठकर आगे के सफर के लिए नई ऊर्जा मिलती है। विख्यात लेखक रामदयाल नीरज कहते हैं कि पहाड़ के जीवन में जल व पौधों का संरक्षण पहले स्थान पर है। जहां कुआं तैयार है, वहां पौधा भी मिलेगा। यानी जल के साथ पर्यावरण का संरक्षण भी.
Saturday, April 30, 2011
गांव के नीचे दबी मिली 2500 साल पुरानी सभ्यता
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का छोटा सा गांव सोनिक अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर आने वाला है। रेलवे लाइन के किनारे बसे गांव के गर्भ में 2500 साल पुरानी सभ्यता छिपे होने का पता जो चल गया है। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को यहां पर खुदाई के दौरान छठी-सातवीं शताब्दी के सांस्कृतिक व रिहायशी अवशेष मिले हैं। सोनिक रेलवे स्टेशन से करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर स्थित बसहा झील के पास 150 मीटर क्षेत्र में उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग की टीम को खोदाई के दौरान हजारों वर्ष पहले के रिहायशी व सांस्कृतिक अवशेष मिले। अवशेषों में कई ऐसी वस्तुएं मिली हैं, जिससे यहां पर प्राचीन सभ्यता के होने का अनुमान लगाया जा रहा है। अवशेषों में मिट्टी के काले व लाल रंग के भांड (बर्तन), थाली, कटोरे ,छोटे-बड़े आकार के घड़े, अलंकृति व चित्रित पात्र व कुछ छोटे आकार के पूजा पात्र मिले हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक अवशेषों में हड्डी के बने हुए बाण, बाणों के आगे नुकीले हिस्से को रखने के लिये हड्डी के खोल, गले में पहनने वाले पत्थर व मिट्टी के मनके आदि मिले हैं। इसके अलावा रिहायशी अवशेषों में मिट्टी की दीवारों व झोपड़ी के अवशेष मिले। पुरातत्व विभाग के निदेशक डा. राकेश तिवारी व उत्खनन निदेशक डा.राकेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि जिस प्रकार के अवशेष मिले हैं वह करीब ढाई हजार वर्ष पुराने प्रतीत हो रहे हैं। करीब 150 मीटर के दायरे में यह चिह्न पाए गए हैं। डा. सुभाष कुमार यादव ने बताया कि खुदाई 30 तक खत्म कर ली जायेगी। अवशेषों को लखनऊ ले जाया जायेगा। वहां इसे जांच के लिये प्रयोगशाला भेजा जाएगा। जांच के बाद इसकी पूरी रिपोर्ट बनायी जायेगी। जानवरों की हड्डियां मिलीं : उप्र राज्य पुरातत्व विभाग के निदेशक डा. राकेश तिवारी ने 2001 में सर्वेक्षण कर सोनिक में इन अवशेषों की खोज की थी। टीम ने पिछले माह की दस तारीख से खुदाई शुरू की। एक जगह करीब ढाई मीटर खुदाई के बाद जानवरों की हड्डियां व मिट्टी के भांड के काले व लाल रंग के टुकडे़ मिले। सड़क के दूसरी ओर हार्ड मार्क के निशान मिले जिसमें अंदाजा लगाया जा रहा है कि छप्पर आदि खड़े करने के लिये बांस गाड़ने के लिये हार्ड मार्क का प्रयोग किया जाता होगा। करीब आधा दर्जन गोल व यू आकार के चूल्हे भी पाए गए हैं। सामुदायिक चूल्हा भी मिला है। चूल्हों के पास की जमीन काली पायी गयी। खोदाई के स्थान पर छोटे-बड़े कई घरों की मोटी दीवारों की आकृति भी पायी गयी है। फर्शनुमा जमीन भी मिली है। चार मीटर से अधिक गहरी खोदाई में दीवारों में मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े गड़े पाए गए। एक टैरा कोटा सिलिंग बाल भी मिली है जिसका प्रयोग संभवत: गुलैल आदि में किया जाता रहा होगा।
Thursday, April 28, 2011
संस्कृतियों के टेढ़े-मेढ़े रास्ते
| मिजोरम, नगालैंड और मेघालय ईसाई बहुल प्रदेश हैं। साथ ही ये राज्य सरकारी तौर पर अंग्रेजी भाषी हैं। बात भाषा की नहीं है। एक सज्जन बता रहे थे कि किसान से कहा जाता है- पांच एम. एल. दवा डालो। मगर पांच एम. एल. उसके बोध में नहीं है। स्थानीय महौल से पूरी तरह विच्छिन्न भाषा से संवाद इन्हें शिक्षा से दूर न करे तो क्या करे! इनकी अपनी बोलियों को न तो अंग्रेजों ने प्रोत्साहन दिया, न स्वतंत्र भारत की सरकार ने..टवारे ने बंगाल को तो बांटा ही, उत्तर-पूर्व के प्रमुख राज्यों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया। इसी के कारण त्रिपुरा पहुंचना आज भी टेढ़ी खीर है। गौहाटी से सिलचर आनेवाली सड़क से ही सिलचर से थोड़ा पहले बदरपुर से रास्ता त्रिपुरा के लिए है। ट्रेन से भी इसी बदरपुर से धर्मनगर तक आप जा सकते हैं। उसके आगे अगरतला तक के लिए कोई और सवारी। मेघालय के खासी और जयंतिया लोगों की खेती की जमीनें बांग्लादेश सीमा के भीतर हैं। जयंतिया लोगों की पारंपरिक राजधानी जयंतियापुर बांग्लादेश में है। त्रिपुरा की पुरानी रियासत का भी एक बड़ा भाग बांग्लादेश में ही है। ऐसे में सीमा पर कंटीले तार लगाने का उत्साह! विभाजन के समय असम के नेताओं को भय था कि अगर सिलहट के लोग भारत में आने के पक्ष में मतदान कर देंगे तो असम में मुस्लिम बहुमत हो जाएगा। जब ऐसा नहीं हुआ तो वे प्रसन्न हुए। छोटा-सा हिस्सा बराक घाटी का मिला, जो पलायित शरणार्थियों से भरा हुआ है। यहीं मुसलमानों की समस्या पर भी विचार करना लाजिमी है। लक्षद्वीप और कश्मीर के बाद असम सर्वाधिक मुस्लिम आबादी के प्रतिशत वाला प्रांत है। इसे लेकर यहां काफी राजनीति होती रहती है। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा तो वे लोग हैं, जो मुगल सेना के साथ आए थे और लौटकर नहीं जा सके। इनके साथ कुछ ऐसी रवायतें जुड़ी हैं, जो बाकी कहीं भी मुसलमानों में नहीं पाई जातीं। मसलन, इन्होंने स्थानीय महिलाओं से बगैर धर्मातरण कराए निकाह पढ़ाए। मणिपुर में भी मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी इसी प्रक्रिया में बनी है। दूसरी बात यह कि इस समस्या के बारे में बात करते हुए हम मान लेते हैं कि भारत सदा से ऐसे ही था। आजादी से पहले आज के बांग्लादेश और भारत के अन्य हिस्सों से भांति-भांति के लोग आकर इस इलाके में बसते रहे। इस तरह यह अलग-अलग मानव समूहों की मिली-जुली बस्ती की तरह बन गया है। इन सबने इस इलाके को समृद्ध बनाने में मदद की है। धर्म के मामले में चाहे हिंदू हों, चाहे मुसलमान या ईसाई, सबको उनकी मूल धारा से अलग करके देखना ही उचित होगा, क्योंकि धर्मातरण के बावजूद जनजातीय प्रभावों ने उन्हें विशेष पहचान दी है। मिजोरम, नगालैंड और मेघालय ईसाई बहुल प्रदेश हैं। साथ ही ये राज्य सरकारी तौर पर अंग्रेजी भाषी हैं। बात भाषा की नहीं है। एक सज्जन बता रहे थे कि किसान से कहा जाता है- पांच एम. एल. दवा डालो। मगर पांच एम. एल. उसके बोध में नहीं है। स्थानीय महौल से पूरी तरह विच्छिन्न भाषा से संवाद इन्हें शिक्षा से दूर न करे तो क्या करे! इनकी अपनी बोलियों को न तो अंग्रेजों ने प्रोत्साहन दिया, न स्वतंत्र भारत की सरकार ने। अंग्रेजों ने तो इन्हें आजादी के आंदोलन से दूर रखने के लिए सचेत रूप से अंग्रेजी और ईसाइयत दी, लेकिन बाद में भी सरकार ने सहानुभूतिपूर्वक कुछ नहीं किया। सो प्राचीन परंपराओं के साथ यहां की जनजातियों ने संगठित धर्म अपनाए और इस तनाव को आप लगातार देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, मेघालय की तीनों जनजातियां मातृवंशात्मक हैं, पर ईसाइयत की मान्यताएं इससे मेल नहीं खातीं। अरुणाचल प्रदेश तो बाकायदे सरकारी तौर पर प्रकृतिपूजक लोगों की बहुतायत वाला प्रदेश है। वहां दोनों पाउलो की पूजा होती है। वह शायद एकमात्र ऐसा प्रदेश है, जिसकी कोई राजकीय भाषा नहीं। क्या हल है इस उत्तर-पूर्व नामक समस्या का? सबसे पहली बात तो यह कि बहुमतवादी लोकतंत्र में 500 से अधिक सांसदों की संसद में यहां के लोग अपना निर्णायक प्रतिनिधित्व नहीं देखते। सो, उसमें कोई भी खास रुचि नहीं लेता। स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं भी दलाल राजनीतिक वर्ग के कब्जे में हैं। सैनिक समाधान कोई समाधान नहीं है, यह तय है। बांग्लादेश, चीन और म्यांमार से दोस्ताना रिश्तों के बगैर इस समस्या का एक पहलू हल होने से रहा। स्वशासन के संबंध में भी नए प्रयोग करने होंगे। अन्यथा महज भूभागीय एकता की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है समूचे देश को। रोज-रोज की हिंसा से समूचे देश की संवदनाएं भोथरी हो रही हैं। काले कानूनों के लिए तर्क के बतौर इस इलाके का उपयोग भी बंद होना चाहिए। |
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