Wednesday, January 19, 2011

पुराने आप्रवासियों का देश भारत

चीयरफुल TBre

उत्तर भारत में चाय की पत्तियों को पानी, दूध और अदरक सहित कई जड़ी-बूटियों के साथ उबालते देखा जा सकता है। कुछ लोग इसमें दालचीनी का इस्तेमाल कर मसाला-चाय बनाते हैं, जबकि पूर्वी यूपी-बिहार जैसे आंचलिक क्षेत्रों में पानी गर्म करने के साथ उसमें चाय की पत्ती डालने का रिवाज है
चाय पर किसी को न्यौता देने या खुद कहीं चाय पर बुलावा आने का सामाजिक तौर-तरीका काफी पुराना है। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद, आज भी चाय पार्टी के बुलावे पर हम जाने को उत्सुक रहते हैं। हम लंबी दूरी का सफर कर रहे होते हैं, लेकिन साथ सफर कर रहे किसी अजनबी के साथ चुप्पी तोड़ने का मुफीद जरिया चाय पिलाना ही दिखता है। हम ताश खेल रहे हों या कलीग के साथ गप्पें हांक रहे हों, बॉस को बढ़िया आइडिया सुझाने में मदद कर रहे हों या पड़ोसी के साथ किसी जरूरी बातचीत में मशगूल हों, चाय कहीं न कहीं से हर चीज के सेंटर में आती ही है। सदियों पुरानी इस लत को कई तरह से चित्रित किया गया है। उत्तर भारत में चाय की पत्तियों को पानी, दूध और अदरक सहित कई जड़ी-बूटियों के साथ उबालते देखा जा सकता है। कुछ लोग इसमें दालचीनी का इस्तेमाल कर मसाला-चाय बनाते हैं, जबकि पूर्वी यूपी-बिहार जैसे आंचलिक क्षेत्रों में पानी गर्म करने के साथ उसमें चाय की पत्ती डालने का रिवाज है। जब कुछ-कुछ कत्थई रंग का पानी हो जाता है, तब उसे चूल्हे पर से उतार दिया जाता है। आपने इन क्षेत्रों में व्यापक रूप से इसे मलाई वाली चायकहते भी सुना होगा। इसके साथ बड़े आकार वाला नमकीन बिस्कुट भी इसमें डुबो-डुबोकर खाया जाता है। सड़क किनारे गुमटी या ठेले पर चाय की दुकान सजाए लाखों लोगों की कमाई का यह बड़ा जरिया बन चुका है। आम दिनों में हम दिहाड़ी मजदूर से लेकर राह चलते लोगों को इन्हीं गुमटियों या ठेलों से मलाई वाली चायमांगते और वहीं खड़े-खड़े पीते देखते हैं। लेकिन पंजाब में दूसरी तरह से मलाई वाली चायबनती है। संगरूर में, शायद इसे बेस्ट मसाला चाय कहते हैं। पंजाब में उबलते पानी में दालचीनी का पाउडर के साथ दूसरे मसाले का सुगंध डालते और उनके अर्क पानी में उतर आने के बाद उसे फूंक-फूंक कर पीते देखा है। कहीं-कहीं तो चाय में सब कुछ पड़ जाने के बावजूद उबलते चाय में थोड़ी और चीनी व चाय की पत्ती डालकर उसे तब तक उबालते हैं, जब तक वह लाल और भूरे रंग की नहीं हो जाती।
अगर आप बंगाल की चाय समझने बैठें, तो वहां ब्लैक टी दिन में खूब पी जाती है, जबकि दोपहर बाद वहां चाट खाने का रिवाज है। इसके बाद असम वाली चाय का दोतीन दौर चलता है। असम टी के साथ आटे का बना स्नैक्स खाने का वहां पारंपरिक रिवाज है। बल्कि कुछ लोग तो अपने चाय में दूध का हल्का फ्लेवर मिलाते हैं। इन दिनों चाय में तुलसी की पत्ती डालना नहीं भूलते। तुलसी की पत्ती पड़ी चाय वैसे भी जाड़े में गर्माहट लाती है, स्किन में चमक लाती है सो अलग। इन दिनों ग्रीन टी की पत्तियां डालने का रिवाज काफी है। कोलकाता में चाय बनाने की परंपरा ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के बाद नये र्ढे पर आयी। बात 19वीं सदी की है। बंगाल की पारंपरिक चाय बनाने की छाप पर कहीं न कहीं कंपनी के आगमन का भी असर रहा है। मसाला चाय जहां उत्तर भारत के चलन में आयी, व्लैक टी भी धीरे-धीरे चलन में आ गयी, हालांकि यह स्टेटस सिम्बल के तौर पर देखी जाती है।
इसके बाद, मुंबई में कुछ होटलों में भी व्लैक टी कल्चर के तौर पर उभरा। यहां आयोजित होने वाले टी फेस्टिवल में पकौड़ा, सैंडविच और समोसे का चलन आम बात है। मुंबइया होटलों के कई शेफ बताते हैं कि ग्राहकों की खास पसंद अब काली चाय ही नहीं, बल्कि पर्सनालिटी के तौर पर पीच, ग्रीन एप्पल, केमोमाइल, र्हब्स, स्पाइसेज, लेमन और जिंजर हो चुके हैं। मुंबई में लोग चाय पीने को हल्के में नहीं लेते, बल्कि वे चाय पीने के दौरान कई जरूरी बातें भी करते हैं, जिससे उनकी फाइनेंशियल हेल्थ भी बढ़िया रहती है।

Saturday, January 15, 2011

क्या वैदिक मंत्र भी करा सकते हैं बारिश!

क्या प्राचीन मंत्र वर्षा करा सकते हैं? इन वैदिक मंत्रों का आसपास के वातावरण पर क्या असर पड़ता है? वैज्ञानिकों का एक दल इन सवालों का जवाब जानने के लिए केरल के प्राचीन गांव पंजल में अप्रैल में होने वाले अनुष्ठान के दौरान इसका अध्ययन करेगा। 31 सौ साल पुराने इस अनुष्ठान को स्थानीय भाषा में अतिरथराम कहते हैं। नंबूदरी ब्राह्मणों वाले पंजल गांव के वैदिक विद्वानों का कहना है कि वैदिक संस्कारों का पर्यावरण और मनुष्यों पर सकारात्मक प्रभाव होता है। पंजल गांव केरल के पलक्कड़ जिले की त्रिचूर सीमा पर नीला नदी के पास स्थित है। देवताओं का आह्वान करने के लिए यहां के एक लक्ष्मी नारायण मंदिर में 4 से 14 अप्रैल तक अनुष्ठान चलेगा। इसे 14 पुजारियों द्वारा किया जाएगा। इंटरनेशनल स्कूल ऑफ फोटोनिक्स, कोचीन यूनिवर्सिटी के पूर्व निदेशक वी.पी.एम. नंबपूरी के नेतृत्व में वैज्ञानिकों का एक दल वैदिक मंत्रों और अनुष्ठान का वातावरण के प्रभाव का अध्ययन करेगा। वैज्ञानिकों द्वारा जारी बयान के मुताबिक, 11 दिन के अनुष्ठान से प्रकृति, मनुष्यों और अन्य सभी जीवित प्राणियों पर होने वाले प्रभावों के वैज्ञानिक आकलन का मौका मिलेगा। नंबपूरी ने कहा, मंत्रों का उच्चारण, औषधि और जड़ी बूटियों से हवन करने से पर्यावरण संरक्षित रहता है और ऊर्जा मिलती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अनुष्ठान के दौरान तापमान, नमी और दबाव के स्तर में वातावरण में होने वाले बदलाव के बारे में विस्तृत परीक्षण किया जाएगा। साथ ही मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों और उपज से पौधों और जानवरों पर होने वाले प्रभाव का भी अध्ययन किया जाएगा। शोध में मनुष्य पर होने वाले शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव का भी अध्ययन किया जाएगा, जो योग करते है। ट्रस्ट के प्रमुख शिवाकरन नंबूदरी ने कहा, अतिरथराम ने 35 साल पहले पंजल में, 1990 में कुंदूर और 2006 में किजहाककेनचेरी में वर्षा कराई थी। गांव में 35 साल पहले अतिरथराम का आयोजन किया गया था। तब इसे हेलसिंकी, हार्वर्ड जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों का समर्थन मिला था।

Saturday, January 1, 2011

बच्चों को पढ़ने पंजाब भेजने लगे एनआरआइ

 विदेशों में बसे पंजाबियों के पास आज पैसा तो बहुत है, लेकिन बच्चों में पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से उन्हें चिंता में डाल दिया है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में एनआरआइ पंजाबियों ने अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए स्वेदश (पंजाब-हिमाचल) भेजना शुरू कर दिया है, ताकि वे अपनी मिट्टी, विरासत और जड़ों से जुड़े रहें। वर्जीनिया में रहे जगरूप सिंह गिल ने अपने दोनों बच्चों को बड़ू साहिब (हिमाचल) में पढ़ने के लिए भेजा है। बाल्टीमोर(अमेरिका) के रणजीत कुमार और टोरंटो के सुपिंदर सिंह के बच्चे भी इसी स्कूल में पढ़ते हैं। करीब आठ माह पहले टोरंटो से बठिंडा पहुंची अमनदीप कौर ने भी अपने दोनों बच्चों का दाखिला सेंट जेवियर स्कूल में कराया है। उनका मानना है कि विदेशी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव में युवा पीढ़ी नशेड़ी होती जा रही है। अमनदीप कहती हैं कि वह अपने बच्चों को मातृभाषा से जोड़े रखने के लिए ही उन्हें यहां लेकर आई है। कैलीफोर्निया में रह रही घोलिया गांव की रुपिंदर कौर ने अपने तीन वर्षीय बेटे को नाभा में दादा-दादी के पास भेज दिया है। बठिंडा के दिल्ली पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल अरुण कुमार और गुरुसर सुधार (लुधियाना) के जतिंदरा ग्रीन फील्ड स्कूल की प्रिंसिपल मनप्रीत कौर बताती हैं कि उनके स्कूलों में भी कई अप्रवासियों के बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं। अमेरिकन फे्रंड्स सर्विस कमेटी के दक्षिण-एशिया संगठक और बठिंडा निवासी डा. सुरिंदर सिंह गिल बताते हैं कि कनाडा व अमेरिका में ऐसे बहुत से मामले सामने आ रहे हैं जिनमें युवा पीढ़ी अपने मां-बाप को ओल्डएज होम जाने की सलाह देती है। ऐसे हालत देख पंजाबियों की रूह कांपने लगी है। इसलिए लोग अपने बच्चों को वापस अपनी जड़ों से जोड़ने में लग गए हैं।