Sunday, December 26, 2010

क्रिसमस का त्योहार

ईसा मसीह मुझे बहुत प्रिय हैं और बाइबल उतना ही अच्छा लगता है जितना कोई और धर्म ग्रंथ, लेकिन यही बात मैं क्रिसमस के त्योहार के बारे में नहीं कह सकता। ईसाइयत का प्रशंसक होते हुए भी क्रिसमस के प्रति उत्साह न होने का एक बड़ा कारण यह है कि यह धीरे-धीरे विश्र्व त्यौहार का रूप लेता जा रहा है। कोलकाता में बचपन से ही मैं यह देखता रहा हूं कि बड़ा दिन सचमुच बड़े दिन की तरह मनाया जाता है। बंगाली परिवारों में इस दिन माहौल खुशनुमा हो जाता था और लड़के पिकनिक की तैयारी में लग जाते थे। धीरे-धीरे यह के्रज बढ़ता ही गया है। क्रिसमस के दिन देश के प्राय: सभी शहरों से जो खबरें आई, उनसे लगा कि यह अब भारत के शिक्षित और समृद्ध वर्ग का पर्व बन गया है और लोग इसका साल भर इंतजार करते हैं कि क्रिसमस आए और इसका भरपूर आनंद उठा सकें। यदि हम पूरे देश में मनाए जाने इस त्योहार की दिल्ली के संदर्भ में ही बात करें तो देश की राजधानी के खास-खास हिस्से दुलहन की तरह सजाए गए थे। यह खास हिस्से उन जगहों पर और भी मनोरम तरीके से सजाए गए थे जहां इस वर्ग के लोग ज्यादा संख्या में निवास करते है अथवा घूमते-फिरते हैं। इस तरह पूरा शहर ऐसा लग रहा था मानो हम एक और दीपावली का त्योहार मना रहे हों। हालांकि, मुझे इस बात से क्यों तकलीफ होने लगी कि भारत के लोग बड़े उत्साह से ईसाइयों का त्योहार धूमधाम से मना रहे हैं। अलबत्ता इसके पीछे अगर सर्वधर्म सद्भाव होता तो मुझे और भी खुशी होती। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यूरोप और अमेरिका के ईसाई हिंदुओं, मुसलमानों और बौद्धों के पर्व को अपना नहीं मानते तो फिर यह सहज सवाल मन में उठना स्वाभाविक है कि हम ही उनके धार्मिक दिवस को अपना मान कर क्यों चल रहे हैं? सबको अपनी श्रद्धा के अनुसार चलने की आजादी है। भारत अगर आगे बढ़ कर दुनिया के प्रमुख धर्मो को अपनाता है और उन्हें अपना ही धर्म मानता है तो इससे उसकी विशाल और सबके प्रति उदार हृदयता ही प्रगट होती है, लेकिन वास्तविकता में ऐसा है नहीं। भारत में क्रिसमस के उत्साह के पीछे न तो ईसाइयत के प्रति आकर्षण है और न ईसा मसीह के प्रति श्रद्धा। थोड़ा कठोर होकर कहा जाए तो यह हमारे औपनिवेशिक इतिहास की वह विरासत है जो अभी तक हमारे मनो-मस्तिष्क में बनी हुई है और यह क्रिसमस की परंपरा के बहाने अभिव्यक्त हो रही है। आज हमने बहुत धूमधाम से बड़ा दिन मनाना शुरू कर दिया है, क्योंकि कभी हमारे अंग्रेज शासकों का यह सबसे बड़ा त्यौहार हुआ करता था। शासक वर्ग की भाषा, पोशाक, पर्व, रहन-सहन आदि का ढर्रा धीरे-धीरे शासितों को भी अच्छा लगने लगता है और वह उन्हें अपनाने लगते हैं। आज बड़े दिन का त्यौहार इसी मानसिक और सामाजिक प्रक्रिया के तहत भारत के उस वर्ग का त्यौहार बन गया है जो कभी अंग्रेज शासकों के संपर्क या प्रभाव में रहा करता था। चूंकि यही वर्ग आजादी हासिल होने के बाद भी भारत की राजनीतिक और आर्थिक सत्ता पर अपना एकाधिकार बनाए रखने में सफल रहा है, इसलिए गुलामी के सांस्कृतिक अवशेष क्रमश: मजबूत होते चले गए। अंग्रेजों के जमाने में 25 दिसंबर को सरकारी दफ्तर बंद रहते थे। स्कूल-कॉलेजों में छुट्टी रहती थी। यह बात समझ में आती है, क्योंकि प्रत्येक शासक अपनी संस्कृति और अभिरुचियां अपने द्वारा पराजित अथवा विजित समाज पर लादने व थोपने का प्रयास करता ही है। इस बारे में हालांकि यह बात किसी भी तरह समझ में नहीं आती कि आजादी के बाद भी 25 दिसंबर को सार्वजनिक छुट्टी का दिन क्यों बनाए रखा गया? इस परंपरा को बनाए रखने का तर्क आज समझ से परे है। भारत में ईसाइयों की संख्या अंग्रेजों के जमाने में भी थोड़ी-सी ही थी और आज भी इनकी संख्या थोड़ी-सी ही है। उन्हें इस दिन छुट्टी चाहिए तो यह छुट्टी उन्हें मिलनी ही चाहिए, लेकिन तब इसे सीमित या प्रतिबंधित छुट्टी का दिन घोषित किया जा सकता था। परंतु ऐसा करने के बजाय हमारे हुक्मरानों ने इस दिन को सभी के लिए सार्वजनिक अवकाश के रूप में घोषित कर दिया। एक बार किशन पटनायक ने एक निजी बातचीत में यह प्रश्न उठाया था कि अगर दुनिया भर में अंग्रेजों का आधिपत्य नहीं होता, क्या तब भी शेक्सपियर इतने बड़े लेखक माने जाते? आज अंग्रेजी एक तरह से विश्र्व भाषा बन चुकी है। परंतु क्या हम कह सकते हैं कि इसके पीछे अंग्रेजी भाषा की सर्वश्रेष्ठता है या अंग्रेजी बोलने वालों का वर्चस्व? यह कोई ऐसा कठिन प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर हम न सोच सकें। भारत के एक बड़े हिस्से में अंग्रेजी की घुसपैठ हो चुकी है, लेकिन पांडिचेरी में फ्रेंच का और गोवा में पुर्तगाली भाषाओं का प्रभुत्व था, क्योंकि इन इलाकों में क्रमश: फ्रेंच और पुर्तगाली लोगों का शासन था। अगर स्वतंत्र भारत ने एक देशी भाषा नीति बनाई होती तो आज अंग्रेजी का वह वर्चस्व नहीं दिखाई पड़ता। आज इसके कारण देश के लाखों बालक-बालिकाओं की क्षमता कुंठित हो कर रह जाती है। आजादी के संघर्ष के दौरान पश्चिमीकरण को अभिशाप माना जाता था। महात्मा गांधी के हिंद स्वराज में पश्चिमी संस्कृति की तीव्र भ‌र्त्सना की गई थी। अब यह तर्क दिया जाने लगा है कि आधुनिकता एक तरह की नहीं होती कई तरह की हो सकती है, लेकिन भारत के तथाकथित सुसंस्कृत वर्ग में तो एक ही तरह की आधुनिकता देखी जाती है।

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