Wednesday, June 1, 2011
जल को देवता मानते हैं हिमाचल के लोग
सरकारी नलों के जमाने में भी हिमाचल के अधिकांश जिलों के ग्रामीण आज भी कुओं-बावडि़यों को सहेज कर रखे हुए हैं, क्योंकि वे जल को देवता मानते हैं और उसकी पूजा करते है। ग्रामीण इलाकों में तो पानी भरने से पहले जल देवता का अभिषेक किया जाता है। हिमाचल में सरकारी नल और हैंडपंपों की मौजूदगी के बावजूद विभिन्न जिलों में स्थित गांवों में लोग अभी भी प्राकृतिक जलस्रोतों का पानी ही उपयोग में लाते हैं। जलस्रोतों को औलाद की तरह मानने वाले लोग सुबह-सवेरे पानी लेने के लिए बावड़ी पर ही पहुंचते हैं। इसमें से एक लोटा शुद्ध जल अलग से भरकर पूजा के लिए रख दिया जाता है। हर जलस्रोत के पास छोटा सा देवालय भी जरूर मिलेगा। कुछ ऐसा ही नजारा सुन्नी का न्हेवट, ठियोग, रेगटू और बिजलीधार, लोअर लोहारा आदि देखने को मिलता है। प्राकृतिक स्रोत के जल से घर के मंदिर में ठाकुर अथवा ग्राम देवता की प्रतिमा का अभिषेक करने के बाद उसका सेवन किया जाता है। शिमला जिले के दूरस्थ गांव तंदाली के लोग स्थानीय नदी दोगड़ा को मां की तरह मानते हैं। यहां के पानी को पवित्र माना जाता है। पानी भरने से पहले जल देवता की मूर्ति का अभिषेक किया जाता है। कोई भी व्यक्ति दोगड़ा नदी में किसी तरह का कचरा नहीं फेंकता है। बुजुर्ग मोहीराम व नोखराम का कहना है कि उनके पूर्वजों ने इन बावडि़यों को मुश्किल से तैयार किया था। वह अपनी औलाद से भी बढ़कर इनकी देखभाल करते रहे। यही संस्कार उन्होंने अगली पीढि़यों को दिए। क्यारा पंचायत के लोगों का कहना है कि शहर जाने के लिए उन्हें आठ किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता है। रास्ते में पड़ने वाली इन बावडि़यों के इर्द-गिर्द पेड़ लगाए गए हैं। पानी पीकर पेड़ों की शीतल छाया में बैठकर आगे के सफर के लिए नई ऊर्जा मिलती है। विख्यात लेखक रामदयाल नीरज कहते हैं कि पहाड़ के जीवन में जल व पौधों का संरक्षण पहले स्थान पर है। जहां कुआं तैयार है, वहां पौधा भी मिलेगा। यानी जल के साथ पर्यावरण का संरक्षण भी.
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