Sunday, September 23, 2012

समकालीन अनुभवों की कला-यात्रा

बलराम कला की कोई भी धारा एकांत में अनंत की अभिव्यक्ति होती है। यह जीवन का राग है, जिसमें उसकी अपनी आंतरिक लय निहित होती है। चित्रकला मानवीय अभिव्यक्ति की आदिम आकांक्षाओं का प्रतीक है, जिसे आज भी प्राचीन गुफाओं के भित्तिचित्रों में देखा जा सकता है। उनकी मौन भाषा हजारों साल बाद अब भी सुनी जा सकती है। कहते हैं कि जब कोई अनुभव शब्दातीत होने लगता है तो वह रंग और रेखाओं में ढलने के लिए विकल हो उठता है। देश-विदेश के कलाकारों की उस विकलता को किताब की शक्ल में भावकों के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश की है अजय जैन ने, इंटरनेशनल आर्ट नाम की किताब में। इसमें हम देख सकते हैं भारत के पिकासो कहे जाने वाले कलाकार मकबूल फिदा हुसैन की पेंटिग्स। रेखाओं और रंगों के विशिष्ट संयोजन से निखरे हुसैन के चित्र अपनी सृजनात्मकता से सहज ही आकृष्ट कर लेते हैं। गुलाम रसूल संतोष के शैव दर्शन पर आधारित चित्रों की रेखाओं और रंगों में अद्भुत सामंजस्य है, जो दर्शकों पर जादू-सा कर देता है। चित्रों के वैशिष्ट्य से अनजान दर्शक आनंदमग्न हो घंटों उनके चित्रों को देखता रह जाता है। इस किताब में नरीन नाथ के चित्रों में टुकड़ा-टुकड़ा जीवन झांकता है, जिनकी अलग दुनिया है, जिसमें चरित्र अपना सहज जीवन जीते दिखते हैं। नरीन ने देश-विदेश में अपने चित्रों से धूम मचाई और विख्यात हुए। इसी तरह के. खोसा के चित्रों में उनकी गहन अनुभूतियों की छाया तो दिखती ही है, उनका अध्ययन-मनन और प्राचीन ज्ञान भी झांकता लगता है। स्थूल आकारों के बजाय उनका मन सूक्ष्म संयोजनों में ज्यादा रमता है। ललित शर्मा के चित्र राजस्थान की मिट्टी की सोंधी महक बिखेरते हुए विभिन्न शैलियों के जरिए कलात्मक ऊंचाइयों का स्पर्श करते हैं। बेहद सरल जीवन जीने वाले ललित शर्मा के चित्र उनके अनुकरणीय जीवन की अनुकृति लगते हैं, जिनमें उनका जीवन-दर्शन भी झलकता है। अर्पणा कौर बेहद संवेदनशील और भावुक सर्जक हैं। समय के विभिन्न कालखंड उनके चित्रों में साकार हो उठते हैं, जिनमें मनुष्य के भटके हुए कदमों के अक्स भी देखे जा सकते हैं। अर्पणा के चित्र भी इस किताब में शामिल हैं। माखन शाह अपने पावरफुल स्ट्रोक्स के लिए जाने जाते हैं, जिनके जरिए वे कैनवास पर बेहद खूबसूरत संसार रच देते हैं। वे चाहे प्राचीन आख्यानों पर रचे गए चित्र हों या राष्ट्र-समाज पर केंद्रित चित्र, उनमें ऊर्ध्व गामी चेतना निरंतर सक्रिय रहती है। शबीर संतोष के चित्र बादलों की तरह उमड़ते-घुमड़ते दृष्टिगोचर होते हैं। अपने पिता गुलाम रसूल संतोष की तरह ही रंग चयन के प्रयोग आश्चर्यचकित कर देता है। उनके चित्रों में स्नेहिल मन की उड़ान है। अनीता नारायण के चित्र दर्शक के सामने प्रकृति की अद्भुत छटा बिखेर देते हैं। इंटरनेशनल आर्ट में शामिल गीतादास मूलत: चित्रकार हैं, लेकिन इनकी उंगलियां तूलिका के साथ कलम से खेलना भी जानती हैं, कथाकार-चित्रकार रामकुमार की तरह। दुनिया के अनेक देशों में गीतादास की प्रदर्शनियां लगीं तो भारत की तरह वहां भी उन्हें सराहना मिली। मनुष्य-मन के सूक्ष्म भावों को पकड़कर उन्हें अभिव्यक्त करना कोई उनसे सीखे। गणपत बड़के का नाम और काम दोनों ही दर्शकों को लुभाते हैं। जीवन की संवेदनशील यात्रा पर निकले इनके चित्र संसार का कालचक्र दिखाते हैं, तो सुरेंद्र जगताप के श्वेत-श्याम चित्र जीवन की सच्चाइयों को सहज अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं, जिनमें एक सम्मोहन होता है। इसी तरह आलोक कुमार के चित्रों में भारतीय जन-जीवन की झलक मिलती है। अभय वर्मा यों तो हर तरह के चित्र बनाने में माहिर हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाते गांधी पर बनाए गए इनके चित्र ठहरकर सोचने के लिए विवश कर देते हैं। किताब में प्रमिला सिंह अपने अमूर्त चित्रों के माध्यम से मनुष्य जीवन के गूढ़ रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिश करती हैं। जन मानस की सूक्ष्म और अमूर्त भावनाओं को अभिव्यक्त करते के. दामोदरन के चित्रों में जीवन वैसे ही धड़कता है, जैसे मुक्तिबोध की कविताओं में। जीवनानुभवों के रेखांकन और शब्दांकन में इन्हें ज्यादा भेद नहीं लगता। ऐसे ही संदीप भाटिया के चित्रों में स्वप्निल संसार की कोमलता और माधुर्य दिखता है तो फ्रांसीसी चित्रकार क्रिश्चल दुओ जीवन की जटिलताओं को रंगों के माध्यम से साकार कर देती हैं। इंटरनेशनल आर्ट में शामिल श्याम शर्मा कला की दुनिया के जाने-माने हस्ताक्षर हैं। जमीन से जुड़े इस कलाकार के चित्रों में ग्रामीण जीवन के चरित्रों, खासकर बच्चों के उल्लासपूर्ण जीवन से अद्भुत प्रभाव पैदा होता है। बुद्ध के जीवन के जरिए इन्होंने आध्यात्मिक यात्रा भी की है। मनीष वर्मा कला के विभिन्न माध्यमों में सक्रिय हैं। फिल्मों से भी अपनी बात कहते रहे हैं। अमूर्त चित्रों के जरिए सशक्त अभिव्यक्ति करने में सक्षम मनीष देश-विदेश में अनेक पुरस्कार हासिल कर चुके हैं। रश्मि सिंह अगर भारतीय मिथकों पर अच्छी पकड़ रखती हैं तो कुसुम वर्मा और नीरा डावर अमूर्त चित्रों के माध्यम से अपनी बात कहती हैं। पद्मिनी मेहता रेखाओं के जरिए तो राजी चाको अमूर्त तरीके से स्त्री की विभिन्न मन:स्थितियों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं। एक तरफ चेताली चटर्जी बांग्ला जनजीवन से अपनी बात कहती हैं और सुनीता बधवान, अर्चना शर्मा व सानिया अग्रवाल मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं, तो दूसरी तरफ छवि भार्गव, आकाश सूरी, राशिद अहमद और मालविका जैन के चित्र ताजगी का अहसास कराते हैं। कुल मिलाकर, देश के लगभग सभी प्रांतों के चित्रकारों को तो इस किताब में जगह मिली ही है, कई विदेशी कलाकार भी इसमें शामिल हैं, जिससे यह एक मनभावन किताब बन गई है। दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण पेज -8,23-9-2012

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