क्या प्राचीन मंत्र वर्षा करा सकते हैं? इन वैदिक मंत्रों का आसपास के वातावरण पर क्या असर पड़ता है? वैज्ञानिकों का एक दल इन सवालों का जवाब जानने के लिए केरल के प्राचीन गांव पंजल में अप्रैल में होने वाले अनुष्ठान के दौरान इसका अध्ययन करेगा। 31 सौ साल पुराने इस अनुष्ठान को स्थानीय भाषा में अतिरथराम कहते हैं। नंबूदरी ब्राह्मणों वाले पंजल गांव के वैदिक विद्वानों का कहना है कि वैदिक संस्कारों का पर्यावरण और मनुष्यों पर सकारात्मक प्रभाव होता है। पंजल गांव केरल के पलक्कड़ जिले की त्रिचूर सीमा पर नीला नदी के पास स्थित है। देवताओं का आह्वान करने के लिए यहां के एक लक्ष्मी नारायण मंदिर में 4 से 14 अप्रैल तक अनुष्ठान चलेगा। इसे 14 पुजारियों द्वारा किया जाएगा। इंटरनेशनल स्कूल ऑफ फोटोनिक्स, कोचीन यूनिवर्सिटी के पूर्व निदेशक वी.पी.एम. नंबपूरी के नेतृत्व में वैज्ञानिकों का एक दल वैदिक मंत्रों और अनुष्ठान का वातावरण के प्रभाव का अध्ययन करेगा। वैज्ञानिकों द्वारा जारी बयान के मुताबिक, 11 दिन के अनुष्ठान से प्रकृति, मनुष्यों और अन्य सभी जीवित प्राणियों पर होने वाले प्रभावों के वैज्ञानिक आकलन का मौका मिलेगा। नंबपूरी ने कहा, मंत्रों का उच्चारण, औषधि और जड़ी बूटियों से हवन करने से पर्यावरण संरक्षित रहता है और ऊर्जा मिलती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अनुष्ठान के दौरान तापमान, नमी और दबाव के स्तर में वातावरण में होने वाले बदलाव के बारे में विस्तृत परीक्षण किया जाएगा। साथ ही मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों और उपज से पौधों और जानवरों पर होने वाले प्रभाव का भी अध्ययन किया जाएगा। शोध में मनुष्य पर होने वाले शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव का भी अध्ययन किया जाएगा, जो योग करते है। ट्रस्ट के प्रमुख शिवाकरन नंबूदरी ने कहा, अतिरथराम ने 35 साल पहले पंजल में, 1990 में कुंदूर और 2006 में किजहाककेनचेरी में वर्षा कराई थी। गांव में 35 साल पहले अतिरथराम का आयोजन किया गया था। तब इसे हेलसिंकी, हार्वर्ड जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों का समर्थन मिला था।
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