उत्तर भारत में चाय की पत्तियों को पानी, दूध और अदरक सहित कई जड़ी-बूटियों के साथ उबालते देखा जा सकता है। कुछ लोग इसमें दालचीनी का इस्तेमाल कर मसाला-चाय बनाते हैं, जबकि पूर्वी यूपी-बिहार जैसे आंचलिक क्षेत्रों में पानी गर्म करने के साथ उसमें चाय की पत्ती डालने का रिवाज है
चाय पर किसी को न्यौता देने या खुद कहीं चाय पर बुलावा आने का सामाजिक तौर-तरीका काफी पुराना है। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद, आज भी चाय पार्टी के बुलावे पर हम जाने को उत्सुक रहते हैं। हम लंबी दूरी का सफर कर रहे होते हैं, लेकिन साथ सफर कर रहे किसी अजनबी के साथ चुप्पी तोड़ने का मुफीद जरिया चाय पिलाना ही दिखता है। हम ताश खेल रहे हों या कलीग के साथ गप्पें हांक रहे हों, बॉस को बढ़िया आइडिया सुझाने में मदद कर रहे हों या पड़ोसी के साथ किसी जरूरी बातचीत में मशगूल हों, चाय कहीं न कहीं से हर चीज के सेंटर में आती ही है। सदियों पुरानी इस लत को कई तरह से चित्रित किया गया है। उत्तर भारत में चाय की पत्तियों को पानी, दूध और अदरक सहित कई जड़ी-बूटियों के साथ उबालते देखा जा सकता है। कुछ लोग इसमें दालचीनी का इस्तेमाल कर मसाला-चाय बनाते हैं, जबकि पूर्वी यूपी-बिहार जैसे आंचलिक क्षेत्रों में पानी गर्म करने के साथ उसमें चाय की पत्ती डालने का रिवाज है। जब कुछ-कुछ कत्थई रंग का पानी हो जाता है, तब उसे चूल्हे पर से उतार दिया जाता है। आपने इन क्षेत्रों में व्यापक रूप से इसे ‘मलाई वाली चाय’ कहते भी सुना होगा। इसके साथ बड़े आकार वाला नमकीन बिस्कुट भी इसमें डुबो-डुबोकर खाया जाता है। सड़क किनारे गुमटी या ठेले पर चाय की दुकान सजाए लाखों लोगों की कमाई का यह बड़ा जरिया बन चुका है। आम दिनों में हम दिहाड़ी मजदूर से लेकर राह चलते लोगों को इन्हीं गुमटियों या ठेलों से ‘मलाई वाली चाय’ मांगते और वहीं खड़े-खड़े पीते देखते हैं। लेकिन पंजाब में दूसरी तरह से ‘मलाई वाली चाय’ बनती है। संगरूर में, शायद इसे बेस्ट मसाला चाय कहते हैं। पंजाब में उबलते पानी में दालचीनी का पाउडर के साथ दूसरे मसाले का सुगंध डालते और उनके अर्क पानी में उतर आने के बाद उसे फूंक-फूंक कर पीते देखा है। कहीं-कहीं तो चाय में सब कुछ पड़ जाने के बावजूद उबलते चाय में थोड़ी और चीनी व चाय की पत्ती डालकर उसे तब तक उबालते हैं, जब तक वह लाल और भूरे रंग की नहीं हो जाती।
अगर आप बंगाल की चाय समझने बैठें, तो वहां ब्लैक टी दिन में खूब पी जाती है, जबकि दोपहर बाद वहां चाट खाने का रिवाज है। इसके बाद असम वाली चाय का दोतीन दौर चलता है। असम टी के साथ आटे का बना स्नैक्स खाने का वहां पारंपरिक रिवाज है। बल्कि कुछ लोग तो अपने चाय में दूध का हल्का फ्लेवर मिलाते हैं। इन दिनों चाय में तुलसी की पत्ती डालना नहीं भूलते। तुलसी की पत्ती पड़ी चाय वैसे भी जाड़े में गर्माहट लाती है, स्किन में चमक लाती है सो अलग। इन दिनों ग्रीन टी की पत्तियां डालने का रिवाज काफी है। कोलकाता में चाय बनाने की परंपरा ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के बाद नये र्ढे पर आयी। बात 19वीं सदी की है। बंगाल की पारंपरिक चाय बनाने की छाप पर कहीं न कहीं कंपनी के आगमन का भी असर रहा है। मसाला चाय जहां उत्तर भारत के चलन में आयी, व्लैक टी भी धीरे-धीरे चलन में आ गयी, हालांकि यह स्टेटस सिम्बल के तौर पर देखी जाती है।
इसके बाद, मुंबई में कुछ होटलों में भी व्लैक टी कल्चर के तौर पर उभरा। यहां आयोजित होने वाले टी फेस्टिवल में पकौड़ा, सैंडविच और समोसे का चलन आम बात है। मुंबइया होटलों के कई शेफ बताते हैं कि ग्राहकों की खास पसंद अब काली चाय ही नहीं, बल्कि पर्सनालिटी के तौर पर पीच, ग्रीन एप्पल, केमोमाइल, र्हब्स, स्पाइसेज, लेमन और जिंजर हो चुके हैं। मुंबई में लोग चाय पीने को हल्के में नहीं लेते, बल्कि वे चाय पीने के दौरान कई जरूरी बातें भी करते हैं, जिससे उनकी फाइनेंशियल हेल्थ भी बढ़िया रहती है।
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