11वीं शताब्दी में बना अल्मोड़ा के कटारमल सूर्य मन्दिर के भीतर अब ढलते सूरज की किरणें नहीं, उगते सूरज की लाली बिखरने लगी है। पुरातत्वविदों ने कोणार्क से भी 200 साल पुराने इस मंदिर के पूरब दिशा के उस दरवाजे को खोल दिया है, जो सदियों से दीवार के अंदर दबा था। 11वीं शताब्दी में बना अल्मोड़ा का कटारमल पहला ऐसा सूर्य मन्दिर है जिसका प्रवेशद्वार पश्चिम में था। श्रद्धालु इसी से मंदिर में प्रवेश करते थे। पुरातत्वविद् हमेशा से यह मानने को तैयार नहीं थे कि किसी सूर्य मंदिर का का प्रवेशद्वार पूरब दिशा में न हो। विशेषज्ञों को आशंका थी कि पूरब दिशा का दरवाजा कहीं दबा है। पिछले साल विभाग ने यह जानने में सफल रहा कि कटारमल का मुख्य द्वार पश्चिम नहीं, पूरब दिशा में है। अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. डीएन डिमरी ने बताया कि एक साल की कड़ी मशक्कत के बाद दरवाजे के बाहर चुनी गई दीवार को हटा दिया गया है। इस काम को अंजाम देने में काफी सावधानी बरती गई। क्योंकि दीवार ध्वस्त करते समय जरा सी लापरवाही दरवाजे को क्षति पहुंचा सकती थी। यह मन्दिर इस लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है कि इसका इतिहास कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी करीब 200 साल पुराना है। आर्कियोलॉजिस्ट डा. डिमरी के मुताबिक कटारमल सूर्य मन्दिर को 11वीं शताब्दी का माना जाता है। मगर, कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिससे कह सकते हैं कि यहां पर सूर्य मन्दिर आठवीं-नवीं शताब्दी में भी था। उस समय के कुछ लकड़ी के गुंबद पहले खोजे जा चुके हैं। जिन्हें दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखा गया है। हो सकता है कि इसके बाद भी यहां पर मन्दिर का पुनर्निर्माण किया गया हो। ऐसा है पूरब का प्रवेशद्वार : लंबाई: पत्थर की आठ सीढि़यां (हर सीढ़ी के बीच में एक फीट का अंतर), चौड़ाई: करीब दो मीटर|
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