Sunday, February 20, 2011

रोजगार के मद्देनजर विश्वविद्यालयों में पंडिताई सीख रहे युवा


आधुनिकता के इस दौर में हालांकि कर्मकांडों की अनिवार्यता जीवंत है, लेकिन हाल के कुछ वर्षो में पुरोहित घटते गए। प्राचीन काल से यह विद्या परंपरागत रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी पंडित लोगों में जीवित रही। कुछ पंडितों के बच्चों के पढ़-लिखकर नौकरी लग जाने के कारण उन्होंने इस धंधे को छोड़ दिया। अब कर्मकांड को रोजगार से जोड़ने के लिए विश्र्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उस पर पाठ्यक्रम चलाने की कवायद की है। ऐसे में अब बेरोजगारी के दौर में युवा इसके प्रति आकर्षित भी हो रहे हैं। नतीजन, धोती-कुर्ता पहने और हाथ में झोला लटकाए पंडित जी की जगह अब शायद आधुनिक पंडित नजर आएं। उनके पास लैपटॉप होगा, जिससे कुंडली जुड़ाने, भविष्य फल देखने जैसे काम सरलतापूर्वक और तुरंत हो जाएंगे। उनका उच्चारण और पूजा-पाठ करने का तरीका भी काफी हद तक पारंपरिक पंडितों की तुलना में बदला दिखेगा। उत्तराखंड मुक्त विश्र्वविद्यालय ने ऐसे समय में कर्मकांड पर सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया, जब गुरुकुल कांगड़ी विवि हरिद्वार ने डीम्ड यूनिवर्सिटी में दूरस्थ शिक्षा के विवाद के कारण डिप्लोमा इन वैदिक कर्मकांड में इस साल से प्रवेश बंद कर दिए। मुक्त विवि में पहले ही सत्र में 39 युवा कर्मकांडी पंडित बनने को प्रवेश ले चुके हैं। आकर्षण इसलिए भी है क्योंकि इसमें संस्कृत की कोई बाध्यता नहीं है। कोर्स में संस्कृत का सामान्य ज्ञान कराया जाना है। जाति-धर्म के बंधन को तोड़ते हुए कोई भी युवा इसमें प्रवेश ले सकता है, तो यह कोर्स महिलाओं के लिए भी कर्मकांड की फील्ड में द्वार खोलता है।
क्या है कोर्स में : नित्य कर्म, प्रात:कालीन भगवत स्मरण, सूर्य उपासना, गायत्री जप महात्म्य, गृहस्थों के लिए भोजन मंत्र, वेद व मंत्र उच्चारण की विधि, पूजन सामग्री एवं उपयोग, गणेश व मातृका पूजन, कलश स्थापन, हवन विधि व पूर्णाहुति, नवग्रह व भूमि पूजन, शिलान्यास, वास्तु शांति एवं गृह प्रवेश विधि, पूजन, नवरात्र, विवाह आदि संस्कारों की विधि।


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