Monday, February 7, 2011

आयल ऋतु कुल राज वसंत


दांत कटकटाती ठंड, कश्मीर-शिमला में बर्फवारी, खेतों में पड़ रहे ओले के साथ छप्पर और छत से टपक रहे बूंदों की सर्दी को भी हम आग, हीटर, गीजर और कुहरते धूप के साथ बर्दाश्त कर ही रहे थे, लेकिन सबसे अधिक गर्माहट तो मन की आशा की थी। मन में वर्षो से संचित पड़ा अनुभवजन्य एक धुंधली सी आस है कि सूरज गरमाएगा, बर्फ पिघलेगी और पाला पड़ना बंद होगा। पूरवैया हवा चलेगी, मनुष्य का हाथ-पैर खुलेगा और तन-मन मस्त हो जाएगा जब वसंत आएगा। प्रकृति में परिर्वतन का नाम है वसंत। वायुमंडल में परिवर्तन है वसंत। सूर्य के तापमान में परिवर्तन है वसंत। वसंत परिवर्तन का प्रतीक है। मनुष्य जीवन में भी परिवर्तन आता रहता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- वसंत आता नहीं, ले आया जाता है। तात्पर्य स्पष्ट है कि हमें व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक राष्ट्रीय जीवन में परिवर्तन लाने का प्रयास करते रहना पड़ता है। संकल्पबद्ध होता है परिवर्तन, क्योंकि जीवन का नाम ही परिवर्तन है। माघ शुक्ल पंचमी के दिन शीतऋतु को भावभीनी विदाई देकर धरती पर वसंत उतरता है। आज का दिन ऋ तुपूजा, रतिपूजा, वेदपूजा, सरस्वतीपूजा, प्रकृतिपूजा, देवपूजा, वसंतपूजा, शिव और कृष्णपूजा का दिन होता है। किसान परिवारों में हलपूजा का भी विधान है। ऋ तुराज वसंत के स्वागत में प्रकृति यौवनमयी हो उठती है। डाल-पात में, कूल-कछारों में, वनों में, बागों में, वसंत बिखर जाता है। आमों में बौर लग जाती है। खेतों में सरसों के फूल देखने में ऐसे लगती है जैसी धरती माता ने पहन रखी हो पीली चूनर। कोयल की कूक मधुर व मनमोहन संगीत की सृष्टि करती है। तभी तो कहा गया है वसंत एक उत्सव बनकर धरती पर आती है। यह तो प्रकृति का एक रूप है, परंतु मनुष्य प्रकृति के संग-साथ ही हंसता-बोलता और जीता-जागता आया है। वसंत यौवन का भी प्रतीक है। मदमस्त करने वाले परिवेश का दाता है। वसंत के यौवन में सभी रसरंग और हमारी कामनाएं फलती-फूलती हंै। भारतीय वांगमय में कामदेव यानी अनंग जिनका अंग ही नहीं है (शिवजी ने अंग जला दिया था) के कामनाओं के भाव जागृत होते हैं। मन में एक अलग उत्साह, उमंग और कामना भर उठती है। मन वासंती-वासंती हो जाता है तभी तो यह गीत सुनने को मिलता है-माई मोरा रंग दे वसंती चोला। भारतीय वांगमय में वासंती रंग त्याग और बलिदान का प्रतीक है। सच में सकारात्मक और उत्सर्गमय कामनाओं का अतिरेक ही तो है मातृभूमि के लिए त्याग और बलिदान। देश भक्ति के लिए भी मन का वासंती होना आवश्यक है तभी तो कपड़े का रंग भी वासंती रखने का रिवाज है। इन भावों इस रूप में बड़ा ही सुंदर भाव मिला है-मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा, दाढ़ी बढ़ाए जोगी हो गइले बकरा। तन के ऊपर पहने गए वस्त्र और अंदर विराजमान मन का रंग एक होना चाहिए। तभी तो मनसा, वाचा, कर्मणा एक होना ही उत्तम स्थिति मानी गई है। वसंत ऋतु के अपने अलग आभूषण हैं, प्रतीक हैं और पहचान है। कोयल की कूक वसंत की पहचान है जो वसंत का श्रृंगार भी है। कोयल से वसंत और वसंत से कोयल की पहचान होती है- काक: कृष्ण, पिक: कृष्ण को भेद पिक काक्यो/वसंत समये प्राप्ते, काक: काक:, पिक: पिक:। सूर्य का गर्म होना भी वसंत का श्रृंगार है। श्रृंगार रस और शिव रस के मैथिल कवि विद्यापति ने वसंत पर बहुत लिखा है-आयल ऋतु कुल राज वसंत, दिनकर किरण भेल पौगंड। मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होता है। कृषि के लिए यह उत्तम स्थिति होती है। सूर्य का तपना आवश्यक होता है। इसलिए मकर संक्रांति से ही उत्सव और पर्वो का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। माघ शुक्ल पंचमी के दिन से ही वसंत आरंभ होता है। इस दिन मंदिरों में श्रीकृष्ण पूजा तथा सरस्वती पूजा की भारी तैयारी होती है। प्रात:काल लोग स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा प्रारंभ करते है। मंडप वंदनावारों से सजाया जाता हैं। पूजा में विविध फल-फूल व पत्र-पुष्प चढ़ाए जाते हैं। पीतांबर की प्रतिष्ठा होती है। मंडप में मूर्ति के समक्ष पूजा, अर्चना, नृत्य-गीत आदि के सुमधुर कार्यक्रम देश के कोने-कोने में होते हैं और प्रसाद का वितरण होता है। वसंत का यह उत्सव परमसुख और धन-धान्य देने वाला होता है। सरस्वतीजी की अराधना करने वाला व्यक्ति आयु, आरोग्य, रूप, ऐश्वर्य और सभी तरह के विद्या, बुद्धि और सिद्धि-संपदा को पाने वाला होता है। यह अब एक सांस्कृतिक पर्व हो गया है। सरस्वती पूजन के दिन ही विद्यारंभ कराने की भारतीय परिपाटी सदियों से चली आ रही है। विद्या की देवी मात्र अक्षर और अंक का ज्ञान नहीं देतीं। वह हमें जीवन दृष्टि देती हैं। वह जीवन दृष्टि जो स्वरूप में भारतीय है और प्राकृतिक व नैसर्गिक है। यह सांस्कृतिक और सनातन भी है। इसलिए सरस्वती की प्रतिमा के साथ जुड़ी सभी वस्तुएं प्रतीकात्मक होती हैं। हंस, कमल, वीणा, पुस्तक और माला का एक विशेष अर्थ है जो हमारे जीवन को सार्थक बनाने का संदेश देते हैं। नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक है, हंस व पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है, कमल विरक्ति का प्रतीक है, लेकिन यह संसार को छोड़कर नहीं, बल्कि उसमें ज्ञानपूर्वक रहते हुए। जल में रहकर विलग जलज ज्यों यानी जल में रहते हुए। गीता में लिखा है-पद्मपात इव अंब भसम। सांसारिक रहते हुए संन्यासी यानी घर का वैरागी। फिल्मी गीत की पंक्ति है-संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे? गृहस्थ जीवन का महत्व वसंत ऋतु में प्रगटहोता है। वसंत भारत का वेलंटाइन डे नहीं, प्रेम में पगा मौसम है। प्रेम के लिए 14 फरवरी जैसा कोई एक दिन यथेष्ट नहीं हो सकता। प्रेम बीज डालने, कली के चटकने, कली से फूल खिलने, डाल पर ठहरने के लिए पूरा वसंत ऋतु चाहिए। माघ शुक्ल पंचमी से चैत माह तक। होली वसंतोत्सव है। प्रकृति के रंग-ढंग के साथ मनुष्य जीवन का मिला-जुला वासंती रंग। लाल और पीत रंग को मिला कर बनता है वासंती रंग। सरस्वती की प्रतिमा के एक हाथ में माला है-इस यक्ष माल में ही सब योग योगते हैं। वीणा प्रतीक है जीवन के संगीत का। वासंती संगीत। संगीत के बिना जीवन नीरस और अधूरा होता है। प्रकृति तो संगीतमय है ही। सरस्वती के उपासक ज्ञानी होंगे केवल साक्षर नहीं। वह जड़ता से दूर, नीर-क्षीर विवेकी, कमल की तरह संसार में रहकर असंसारी, संगीतमय जीवन और इन भावों से जीवन रूपी माला को फेरते रहने वाले बनेंगे। जहां यह ज्ञान है वहां प्रेम भी एकांगी नहीं हो सकता। कम से कम उद्वेगी तो नहीं ही। मन भावन और मनमोहक समय है तो भला भारतीय आख्यानों और वांगमय में प्रेम के प्रतीक कृष्ण को कैसे भूल सकते हैं? इसलिए कृष्ण के वस्त्र पीत वस्त्र हैं, पीला चावल और चढ़ाए जाने फूल भी पीले जो सरसों के फूल होते हैं। कृष्ण को चढ़ाना, नाचना-गाना, पूजा-अर्चना सब चलता है वसंत के दिन। वसंत में शिव का अपना अलग ही महत्व है। वसंत ऋतु में ही शिवरात्रि आती है, परंतु वसंत पंचमी के दिन शिवालयों में भी बड़ी भीड़ रहती है। इस दिन अनका ला पानी भोला, अपने भिखारी हो यानी दूसरे के लिए जीने वाले, सर्वहारा के देव की विशेष पूजा-अर्चना होती है। इन सभी देवों को गुलाल लगाना नहीं भूलते। वसंतोत्सव (होली) पर गुलाल उड़ाए जाते हैं पर वसंत से ही होली की शुरुआत होती है। इसलिए वसंत से ही गुलाल उड़ाने शुरू हो जाते हैं। यूं तो ग्रीष्म, वर्षा, शरद ऋतु में भी भारतीय जीवन दृष्टि समाई हुई है। सबका अपना महत्व है। सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। गर्मी नहीं तो बरसात नहीं, बरसात नहीं तो सर्दी नहीं। पर वसंत तो संपूर्ण भारतीय जीवन दृष्टि और वांगमय के प्रकृतिमय होने का प्रतीक है। इसलिए वसंत का स्वागत करते हुए हम अपनी सनातन, सर्वव्यापी, सर्वग्राही और सर्वधर्मी दृष्टि को ही स्मरण करते हैं। (लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार हैं)


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