मुजफ्फरपुर बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में बसा है-एक गुजरात और एक ईरान। गुजराती अकाल की पीड़ा से बचने और ईरानी व्यापार के ख्याल से आए। शहर उन्हें इतना भाया कि यहीं के होकर रह गए। वर्तमान में सभी राशनकार्डधारी व वोटर हैं, लेकिन इन लोगों ने न अपनी भाषा बदली, न पहनावा। दोनों बस्तियों के लोग शादी-विवाह एवं धार्मिक त्योहार अपनी-अपनी संस्कृति के अनुसार मनाते हैं। सबसे बड़ी विशेषता है कि विवाद होने पर वे अदालत या थाने का सहारा नहीं लेते, बल्कि अपने-अपने मुखिया के फैसले को सहज स्वीकार कर लेते हैं। 1857 में गुजरात में भयानक अकाल पड़ा था। पलायन के क्रम में गुजरात के विडमगांव के पास रहने वाले बाघी समाज के दो दर्जन लोग आश्रय एवं रोजी-रोटी की तलाश में मुजफ्फरपुर आए और इमलीचट्टी में बस गए। आज उनकी बस्ती गांधीनगर के नाम से प्रसिद्ध है। बस्ती मेंसौ से अधिक घर हैं, जहां डेढ़ हजार से अधिक गुजराती रहते हैं। सभी गुजराती बोलते हैं। बस्ती में शीतला माता का मंदिर स्थापित है। यहां हर साल जन्माष्टमी एवं चैती नवरात्र धूमधाम से मनाई जाती है। साल में एक बार सामूहिक विवाह की परंपरा है, वह भी बिना दहेज के। गुजराती बस्ती के नेता संपत बताते हैं कि बस्ती के लोग पुराने कपड़े खरीदकर बेचने का काम करते हैं। वहीं, पांच दशक पूर्व 1961 में ईरान से मंसूर अली मुजफ्फरपुर आए और मेंहदी हसन रोड में अपना बसेरा बना लिया। उन्होंने यहां इमामबाड़ा दरबारे हैदरी की स्थापना की। ईरानी बस्ती में 50 से अधिक परिवार बसे हैं। उनकी आबादी 300 से अधिक है। ईरानियों का मूल निवास ईरान का नजफ-ए-असरफ क्षेत्र है। शादी-विवाह बस्ती के लोगों में ही होती है। बोली फारसी और पहनावा ईरानी है। बस्ती के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन चश्मा एवं नगीना का व्यापार है। स्थानीय वार्ड पार्षद जूही आरा कहती हैं कि सभी ईरानी भारत के नागरिक बन चुके हैं। सभी के पास राशन कार्ड हैं। ये यहां के वोटर हैं। बस्ती के मुखिया बाबा राहत हुसैन बताते हैं कि सभी ईरानी धार्मिक आस्था के साथ मुहर्रम मनाते हैं।
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