प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस महीने होने वाली चीन दौरे में भी फिलहाल दोनों देशों के सैन्य संबंधों पर लगा ताला खुलने की उम्मीद नहीं है। सैन्य रिश्तों सुधारने को लेकर बीजिंग की मनुहार और भारत-रूस-चीन (ब्रिक) शिखर सम्मेलन के हाशिए पर होने वाली उच्च स्तरीय मुलाकातों के बावजूद भारतीय खेमा अभी कोई रियायत देने के मूड में नहीं है। सूत्रों के मुताबिक 14 अप्रैल को चीन के हन्नान प्रांत के सानया शहर में हो रहे ब्रिक शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीनी नेतृत्व से मुलाकात होगी और द्विपक्षीय मसलों पर बात भी होगी, लेकिन रक्षा संबंधों पर लगा विराम तब तक जारी रहेगा जब तक भारत को उन मसलों का समाधान नहीं मिल जाता जिनके कारण यह विराम लगाया गया था। सूत्र बताते हैं कि गत करीब आठ महीनों से सैन्य आदान-प्रदान रोकने के भारतीय फैसले पर चीन ने नई दिल्ली की चिंताओं को दूर करने का कोई भरोसा नहीं दिया है। हालांकि चीन ने यह कभी नहीं कहा कि भारत के साथ उसके सैन्य रिश्तों पर बर्फ जमी है। गौरतलब है कि भारत ने जुलाई 2011 में उत्तरी कमान के तत्कालीन प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बीएस जसवाल को जम्मू-कश्मीर में तैनाती के कारण वीजा दिए जाने से इंकार के बाद नाराजगी जताते हुए सैन्य आदान-प्रदान पर रोक लगा दी थी। हालांकि चीन ने कभी नहीं कहा कि भारत के साथ उसके सैन्य संबंध थमे हैं। इसके अलावा भारत जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को चीन की नत्थी वीजा देने की नीति का भी सख्त विरोध करता रहा है। दिसंबर में चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान भारत ने इस बात पर जोर दिया था कि संबंध सुधार के लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष एक दूसरे की चिंताओं को महत्व दें। आलम यह है कि 2010 की तीसरी तिमाही से जहां सैन्य प्रतिनिधिमंडलों की आवाजाही बंद है। वहीं भारत ने फरवरी 2011 में बेंगलूर में हुए एयरो इंडिया शो का तो न्योता तक चीन को नहीं भेजा था। साथ ही सैन्य रिश्तों में खटास के कारण ही दोनों देशों के बीच दो साल से टल रहे साझा सैन्य अभ्यास का कैलेंडर भी तय नहीं हो पाया है। हालांकि गत दिनों चीन की सेना की ओर से जारी श्वेत पत्र में भारत के साथ सैन्य संबंध मजबूत करने की जरूरत को तरजीह दी गई थी|
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